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भारत के प्राचीन इतिहास को जानने के स्रोत 

प्राचीन भारतीय इतिहास के सन्दर्भ में जानकारी जुटाने के क्रम में हमें विभिन्न स्रोतों का सहारा लेना पड़ता है। प्राचीन इतिहास को जानने के निम्नलिखित तीन महत्वपूर्ण स्रोत हैं-

1.पुरातात्विक स्रोत , 

2.साहित्यिक स्रोत तथा 

3. विदेशी यात्रियों के विवरण।

पुरातात्विक स्रोत 

प्राचीन भारत के अध्ययन के लिए पुरातात्विक सामग्रियां सर्वाधिक प्रमाणिक हैं। इसके अन्तर्गत मुख्यतः अभिलेख, सिक्के, स्मारक, भवन, मूर्तियां, चित्रकला आदि आते हैं।

अभिलेख

  •  पुरातात्विक स्रोतों के अन्तर्गत सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्रोत अभिलेख हैं। प्राचीन भारत के अधिकतर अभिलेख पाषाण शिलाओं, स्तम्भों, ताम्रपत्रों, दीवारों तथा प्रतिमाओं पर उत्कीर्ण हैं।
  •  सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख मध्य एशिया के बोगजकोई नामक स्थान से लगभग 1400 ई.पू. में मिले हैं। इस अभिलेख में इन्द्र, मित्र, वरूण और नासत्य आदि वैदिक देवताओं के नाम मिलते हैं।
  •  भारत में सबसे प्राचीन अभिलेख अशोक के हैं जो 300 ई.पू. के लगभग हैं। मास्की, गुज्जर्रा, निट्टूर एवं उदेगोलम से प्राप्त अभिलेखों में अशोक के नाम का स्पष्ट उल्लेख है। इन अभिलेखों से अशोक के धर्म और राजत्व के आदर्श पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।
  •  अशोक के अधिकतर अभिलेख ब्राह्मी लिपि में है। केवल उत्तरी पश्चिमी भारत के कुछ अभिलेख खरोष्ठी लिपि में है। खरोष्ठी लिपि फारसी लिपि की तरह दाईं से बाई की ओर लिखी जाती है।
  •  लघमान एवं शरेकुना से प्राप्त अशोक के अभिलेख यूनानी तथा आरमेइक लिपियों में हैं। इस प्रकार अशोक के अभिलेख मुख्यतः ब्राह्मी, खरोष्ठी यूनानी तथा आरमेइक लिपियों में मिले हैं।
  •  प्रारम्भिक अभिलेख (गुप्त काल से पूर्व) प्राकृत भाषा में हैं किन्तु गुप्त तथा गुप्तोत्तर काल के अधिकतर अभिलेख संस्कृत में हैं।
  •  कुछ गैर सरकारी अभिलेख जैसे यवन राजदूत हेलियोडोरस का वेसनगर (विदिशा) से प्राप्त गरूण स्तम्भ लेख जिसमें द्वितीय शताब्दी ई.पू. में भारत में भागवत धर्म के विकसित होने के साक्ष्य मिले हैं।
  •  मध्य प्रदेश के एरण से प्राप्त बाराह प्रतिमा पर हूणराज तोरमाण के लेखों का विवरण है।
  •  सबसे अधिक अभिलेख मैसूर में मिले हैं।
  •  पर्सिपोलिस और बेहिस्तून अभिलेखों से पता चलता है कि ईरानी सम्राट दारा ने सिन्धु नदी के घाटी पर अधिकार कर लिया था। दारा से प्रभावित होकर ही अशोक ने अभिलेख जारी करवाया।
  •  सर्वप्रथम 1837 में जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि में लिखित अशोक के अभिलखों को पढ़ा था।

सिक्के

  •  सिक्के के अध्ययन को मुद्राशास्त्र कहते हैं। पुराने सिक्के तांबा, चांदी, सोना और सीसा धातु के बनते थे।
  •  पकाई गयी मिट्टी के बने सिक्कों के सांचे ईसा की आरम्भिक तीन सदियों के हैं। इनमें से अधिकांश सांचे कुषाण काल के हैं।
  •  आरम्भिक सिक्कों पर चिन्ह मात्र मिलते हैं किन्तु बाद में सिक्कों पर राजाओं और देवताओं के नाम तथा तिथियां भी उल्लिखित मिलती है।
  •  आहत सिक्के या पंचमार्क सिक्के-भारत के प्राचीनतम सिक्के आहत सिक्के हैं जो ई.पू. पांचवी सदी के हैं। ठप्पा मारकर बनाये जाने के कारण भारतीय भाषाओं में इन्हें आहत मुद्रा कहते हैं।
  •  आहत मुद्राओं की सबसे पुरानी निधियां (होर्ड्स) पूर्वी उत्तर प्रदेश और मगध में मिली हैं।
  •  आरम्भिक सिक्के अधिकतर चांदी के होते हैं जबकि तांबे के सिक्के बहुत कम थे। ये सिक्के पंचमार्क सिक्के कहलाते थे। इन सिक्कों पर पेड़, मछली, सांड, हाथी, अर्द्धचन्द्र आदि आकृतियां बनी होती थी।
  •  सर्वाधिक सिक्के मौर्यात्तर काल में मिले हैं जो विशेषतः सीसे, चांदी, तांबा एवं सोने के हैं। सातवाहनों ने सीसे तथा गुप्त शासकों ने सोने के सर्वाधिक सिक्के जारी किये।
  •  सर्वप्रथम लेख वाले सिक्के हिन्द-यूनानी (इण्डो-ग्रीक) शासकों ने चलाए

मूर्तियां

  •  प्राचीन काल में मूर्तियों का निर्माण की शुरुआत कुषाण काल से होती है। कुषाण, गुप्त तथा गुप्तोत्तर काल में निर्मित मूर्तियों के विकास में जन सामान्य की धार्मिक भावनाओं का विशेष योगदान रहा है।
  •  कुषाण कालीन गान्धार कला पर विदेशी प्रभाव है जबकि मथुरा कला पूर्णतः स्वदेशी है।
  •  भरहुत, बोधगया और अमरावती की मूर्ति कला में जनसाधारण के जीवन की सजीव झांकी मिलती है।

स्मारक एवं भवन

  •  प्राचीन काल में महलों और मंदिरों की शैली से वास्तुकला के विकास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।
  •  उत्तर भारत के मंदिरनागर शैलीदक्षिण के द्राविड़ शैली तथा दक्षिणा पथ के मंदिर वेसर शैली में है।
  •  दक्षिण पूर्व एशिया व मध्य एशिया से प्राप्त मंदिरों तथा स्तूपों से भारतीय संस्कृति के प्रसार की जानकारी प्राप्त होती है।

चित्रकला

  •  चित्रकला से हमें तत्कालीन जीवन के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।
  •  अजन्ता के चित्रों में मानवीय भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति मिलती है। चित्रकला में ‘माता और शिशु’ तथा ‘मरणासन्न राजकुमारी’ जैसे चित्रों से गुप्तकाल की कलात्मक उन्नति का पूर्ण आभास मिलता है।

अवशेष

  • अवशेषों से प्राप्त मुहरों से प्राचीन भारत का इतिहास लिखने में बहुत सहायता मिलती है।
  •  हड़प्पा, मोहन जोदड़ों से प्राप्त मुहरों से उनके धार्मिक अवस्थाओं का ज्ञान होता है।
  •  बसाढ़ से प्राप्त मिट्टी की मुहरों से व्यापारिक श्रेणियों का ज्ञान होता है।

 

साहित्यिक स्रोत

साहित्यिक स्रोतों को दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है-

 1. धार्मिक साहित्य

 2. धर्मेत्तर साहित्य या लौकिक साहित्य

धार्मिक साहित्य

  • धार्मिक साहित्य में ब्राह्मण तथा ब्राह्मणेत्तर ग्रंथों की चर्चा की जा सकती है। ब्राह्मण ग्रन्थों में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण तथा स्मृति ग्रन्थ आते हैं। ब्राह्मणेत्तर ग्रन्थों में बौद्ध एवं जैन साहित्यों से संबंधित रचनाओं का उल्लेख किया जा सकता है।
  • इसी प्रकार लौकिक साहित्य में ऐतिहासिक ग्रन्थों, जीवनियां, कल्पना प्रधान तथा गल्प साहित्य का वर्णन किया जाता है।

ब्राह्मण साहित्य

वेद-ब्राह्मण साहित्य में सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद है। वेदों के द्वारा प्राचीन आर्यों के धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है।

  • वेद चार हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। वैदिक युग की सांस्कृतिक दशा के ज्ञान का एक मात्र स्रोत वेद है।

ऋग्वेद

  • इसकी रचना हम 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू. के बीच मानते हैं। ऋक् का अर्थ है छन्दों एवं चरणों से युक्त मंत्र। यह एक ऐसा ज्ञान (वेद) है जो ऋचाओं से बद्ध है एवं ऋग्वेद कहलाता है।
  • ऋग्वेद में कुल दस मण्डल  एवं 1028 सूक्त और कुल 10,580 ऋचाएँ हैं। ऋग्वेद के मंत्रों को यज्ञों के अवसर पर देवताओं की स्तुति हेतु होतृ ऋषियों द्वारा उच्चारित किया जाता था।
  • ऋग्वेद में पहला एवं दसवां मण्डल सबसे अन्त में जोड़ा गया है।
  • वेद मंत्रों के समूह को 'सूक्त' कहा जाता है, जिसमें एकदैवत्व तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है।
  • प्रथम और अन्तिम मण्डल, दोनों ही समान रूप से बड़े हैं। उनमें सूक्तों की संख्या भी 191 है।
  • दूसरे मण्डल से सातवें मण्डल तक का अंश ऋग्वेद का श्रेष्ठ भाग है, उसका हृदय है।
  • ऋग्वेद के दो ब्राह्मण ग्रन्थ हैं-ऐतरेय एवं कौषीतिकी अथवा शंखायन।

यजुर्वेद

  • यजु का अर्थ है ‘यज्ञ’। इसमें यज्ञों के नियमों एवं विधि-विधानों का संकलन मिलता है।
  • यजुर्वेद के मन्त्रों का उच्चारण करने वाला पुरोहित ‘अध्वर्य’ कहलाता है। इसके दो भाग हैं-शुक्ल यजुर्वेद एवं कृष्ण यजुर्वेद। शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेयी संहिता के नाम से जाना जाता है। यजुर्वेद कर्मकाण्ड प्रधान है
  • यह पांच शाखाओं में विभक्त है- 1. काठक  2. कपिष्ठल  3. मैत्रायणी 4. तैत्तिरीय 5. वाजसनेयी।
  • यजुर्वेद के प्रमुख उपनिषद कठ, इशोपनिषद, श्वेताश्वरोपनिषद तथा मैत्रायणी उपनिषद है।
  • यजुर्वेद गद्य एवं पद्य दोनों में लिखे गये हैं।

सामवेद

  • ‘साम’ का शाब्दिक अर्थ है गान। इसमें मुख्यतः यज्ञों के अवसर पर गाये जाने वाले मंत्रों का संग्रह है। इसे ‘भारतीय संगीत का मूल’ कहा जा सकता है।
  • सामवेद में मुख्यतः सूर्य की स्तुति के मंत्र हैं। सामवेद के मंत्रों को गाने वाला उद्गाता कहलाता था।
  • सामवेद के प्रमुख उपनिषद छन्दोग्य तथा जैमिनीय उपनिषद हैं तथा मुख्य ब्राह्मण ग्रन्थ पंचविश है।

अथर्ववेद

  • इसकी रचना सबसे अन्त में हुई। इसमें 731 सूक्त, 20 अध्याय तथा 6000 मंत्र हैं। इसमें आर्य एवं अनार्य विचार-धाराओं का समन्वय मिलता है।
  • अथर्ववेद में परीक्षित को कुरूओं का राजा कहा गया है।
  • उत्तर वैदिक काल में इस वेद का विशेष महत्व है।
  • इसमें ब्रह्म ज्ञान, धर्म, समाजनिष्ठा,औषधि प्रयोग, रोग निवारण, मंत्र, जादू-टोना आदि अनेक विषयों का वर्णन है।
  • अथर्ववेद का एक मात्र ब्राह्मण ग्रन्थ गोपथ है। इनके उपनिषदों में मुख्य हैं मुण्डकोपनिषद, प्रश्नोपनिषद तथा मांडूक्योपनिषद

ब्राह्मण ग्रन्थ

  • इनकी रचना संहिताओं की व्याख्या हेतु सरल गद्य में की गई है। ब्रह्म का अर्थ है यज्ञ। अतः यज्ञ के विषयों का प्रतिपादन करने वाले ग्रन्थ ‘ब्राह्मण’ कहलाते हैं। प्रत्येक वेद के लिए अलग-अलग ब्राह्मण ग्रन्थ हैं।
  • ऐतरेय ब्राह्मण में राज्यभिषेक के नियम तथा कुछ प्राचीन अभिषिक्त राजाओं के नाम दिये गये हैं।
  • शतपथ ब्राह्मण में गान्धार, शल्य, कैकेय, कुरू, पांचाल, कोशल, विदेह आदि राजाओं के नाम का उल्लेख है।
  • प्राचीन इतिहास के साधन के रूप में वैदिक साहित्य में ऋग्वेद के बाद शतपथ ब्राह्मण का स्थान।

आरण्यक

  • यह ब्राह्मण ग्रन्थ का अंतिम भाग है जिसमें दार्शनिक एवं रहस्यात्मक विषयों का वर्णन किया गया है।
  • इसमें कोरे यज्ञवाद के स्थान पर चिन्तनशील ज्ञान के पक्ष में अधिक महत्व दिया गया है। जंगल में पढ़े जाने के कारण इन्हें आरण्यक कहा जाता है 
  • उपलब्ध आरण्यक कुल सात हैं-

   1. ऐतरेय, 2. शांखायन, 3. तैत्तिरीय, 4. मैत्रायणी, 5. माध्यन्दिन वृहदारण्यक, 6. तल्वकार, 7. छन्दोग्य।

उपनिषद

  • उप का अर्थ हैसमीपऔर निषद का अर्थ है बैठना। अर्थात् जिस रहस्य विद्या का ज्ञान गुरू के समीप बैठकर प्राप्त किया जाता है, उसे ‘उपनिषदकहते हैं।
  • उपनिषद आरण्यकों के पूरक एवं भारतीय दर्शन के प्रमुख स्रोत हैं। वैदिक साहित्य के अंतिम भाग होने के कारण इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है।
  • उपनिषद उत्तरवैदिक काल की रचनाएं हैं इनमें हमें आर्यों के प्राचीनतम दार्शनिक विचारों का ज्ञान प्राप्त होता है। इसे पराविद्या या आध्यात्म विद्या भी कहते हैं।
  • भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते मुण्डकोपनिषद से उद्धत है। उपनिषदों में आत्मा, परमात्मा, मोक्ष एवं पुनर्जन्म की अवधारणा मिलती है।
  • उपनिषदों की कुल संख्या 108 मानी गई है किन्तु प्रमाणिक उपनिषद 12 हैं। प्रमुख उपनिषद हैं-ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, कौषीतकी, वृहदारण्यक, श्वेताश्वर आदि।

वेदांग

  • इनकी संख्या छः है-शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, ज्योतिष एवं छन्द। ये गद्य में सूत्र रूप में लिखे गये हैं।
  •  शिक्षा-वैदिक स्वरों के शुद्ध उच्चारण हेतु शिक्षा का निर्माण हुआ।
  • कल्प-ये ऐसे कल्प (सूत्र) होते हैं जिनमें विधि एवं नियम का उल्लेख है।
  • व्याकरण-इसमें नामों एवं धातुओं की रचना, उपसर्ग एवं प्रत्यय के प्रयोग समासों एवं संधि आदि के नियम बताए गये हैं।
  • निरूक्त-शब्दों का अर्थ क्यों होता है, यह बताने वाले शास्त्र को निरूक्त कहते हैं। यह एक प्रकार का भाषा-विज्ञान है।
  • छन्द-वैदिक साहित्य में गायत्री तिष्टुप, जगती, वृहती आदि छन्दों का प्रयोग हुआ है।
  • ज्योतिष-इसमें ज्योतिषशास्त्र के विकास को दिखाया गया है।

सूत्र

  • वैदिक साहित्य को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए सूत्र साहित्य का प्रणयन किया गया।
  •  ऐसे सूत्र जिनमें विधि और नियमों का प्रतिपादन किया जाता है कल्पसूत्र कहलाते हैं। कल्पसूत्रों के तीन भाग हैं-
  • श्रौत सूत्र-यज्ञ संबंधी नियम।
  • गृहय सूत्र-लौकिक एवं पारलौकिक कर्तव्यों का विवेचन।
  • धर्म सूत्र-धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक कर्तव्यों का उल्लेख।
  •  धर्म सूत्र से ही स्मृति ग्रन्थों का विकास हुआ। प्रमुख स्मृति ग्रन्थ, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति, नारद स्मृति, वृहस्पति स्मृति, कात्यायन स्मृति, गौतम स्मृति आदि।
  •  व्याकरण ग्रन्थों में सबसे महत्वपूर्ण पाणिनि कृत अष्टाध्यायी है, जिसकी रचना 400 ई.पू. के लगभग की गयी थी ।
  •  सूत्र साहित्य  में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख मिलता है।
  • मनुस्मृति के भाष्यकार (टीकाकार) मेधातिथि, गोविन्दराज, भारूचि एवं कुल्लूक भट्ट थे।
  •  याज्ञवल्क्य स्मृति के टीकाकार विश्वरूप, विज्ञानेश्वर (मिताक्षरा) एवं अपरार्क आदि थे ।
  •  प्रमुख उपवेद हैं-आयुर्वेद, धनुर्वेद,गन्धर्ववेद तथा शिल्पवेद।
  •  मनुस्मृति सबसे प्राचीन तथा प्रमाणिक ग्रंथ माना जाता है।

महाकाव्य      

  • वैदिक साहित्य के बाद भारतीय साहित्य में रामायण और महाभारत नामक दो महाकाव्यों का उल्लेख है।
  • महाभारत महाकाव्य की रचना ई.पू. 400 माना जाता है तथा इन दोनों का अंतिम रूप से संकलन 400 ई. के आस-पास प्रतीत होता है।

महाभारत 

  • इसकी रचना वेद व्यास ने की थी। पहले इसमें केवल 8800 श्लोक थे और इसका नाम जय-संहिता था। बाद में यह बढ़कर 24000 श्लोक  गया और भारत नाम से प्रसिद्ध हुआ क्योंकि इसमें प्राचीनतम वैदिक जन भरत के वंशजों की कथा है।  
  • अन्त में एक लाख श्लोक होने के कारण इसे शत साहस्त्री संहिता या महाभारत कहा जाने लगा। इसकी मूल कथा जो कौरवों और पाण्डवों के युद्ध की है उत्तर वैदिक काल की हो सकती है। महाभारत महाकाव्य अठारह पर्वो में है। महाभारत का प्रारम्भिक उल्लेख आश्वलायन गृहसूत्र में मिलता है।

       रामायण

  • महर्षि बाल्मीकि जी द्वारा रचित रामायण में मुख्यतः 6000 श्लोक थे जो बाद में बढ़कर 12000 श्लोक हो गये पर अन्ततः इसमें 24000 श्लोक हो गये। इसकी रचना सम्भवतः ई.पू. पांचवी सदी में शुरू हुई।
  • रामायण हमारा आदि काव्य है। इसमें हमें हिन्दुओं तथा यवनों और शकों के संघर्ष का विवरण प्राप्त होता है।
  • महाभारत में भी शक, यवन, पारसीक, हूण आदि जातियों का उल्लेख मिलता है।
  • इन महाकाव्यों से हमें प्राचीन भारत वर्ष की सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक दशा का परिचय मिलता है।

पुराण

  • भारतीय ऐतिहासिक कथाओं का सबसे अच्छा क्रमबद्ध विवरण पुराणों में मिलता है। पुराणों के रचयिता लोमहर्ष अथवा उनके पुत्र उग्रश्रवा माने जाते हैं।
  • पुराणों की संख्या अठारह है। अधिकांश पुराणों की रचना तीसरी-चौथी शताब्दी में हुई। अमरकोश में पुराणों के पांच विषय बताए गये हैं।
  • मार्कण्डेय, ब्रह्माण्ड, वायु, विष्णु, भागवत और मत्स्य संभवतः प्राचीन पुराण हैं, शेष बाद की रचनाएं हैं। मत्स्य, वायु और विष्णु पुराण में प्राचीन राजवंशों का विवरण है। मत्स्य पुराण सबसे प्राचीन एवं प्रमाणिक है।
  • महाभारत युद्ध के पश्चात जिन राजवंशों ने ईसा की छठी शताब्दी तक राज्य किया उनके विषय में जानकारी प्राप्त करने का एक मात्र साधन पुराण है।
  • मौर्यवंश के लिए विष्णु पुराण, आन्ध्र सातवाहन  तथा शुंग वंश के लिए मत्स्य पुराण तथा गुप्त वंश के लिए वायु पुराण का विशेष महत्व है।
  • पुराण अपने वर्तमान रूप में संभवतः ईसा की तीसरी और चौथी शताब्दी (गुप्तकाल में) लिखे गये।
  • इस प्रकार ब्राह्मण साहित्य ने प्राचीन भारत के सामाजिक तथा सांस्कृतिक इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश डाला है किन्तु इससे राजनीतिक इतिहास की विशेष जानकारी नहीं प्राप्त होती।

 

ब्राह्मणेत्तर साहित्य

बौद्ध साहित्य

  • भारतीय इतिहास के साधन के रूप में बौद्ध साहित्य का विशेष महत्व है। सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रन्थ त्रिपिटक है। इनके नाम हैं-सुत्तपिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक।
  • सुत्त पिटक-बुद्ध के धार्मिक विचारों और वचनों का संग्रह। इसे बौद्ध धर्म का इनसाइक्लोपीडिया’ भी कहा जाता है।
  • विनय पिटक-बौद्ध संघ के नियमों का उल्लेख किया गया है।
  • अभिधम्म पिटक-बौद्ध दर्शन की  विवेचना तथा दार्शनिक सिद्धांत का उल्लेख किया गया है।
  •  बुद्ध की शिक्षाओं को संकलित कर इन्हें तीन भागों में बांटा गया। इन त्रिपिटकों की रचना बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने के बाद हुई।
  •  जातकों में बुद्ध के पूर्व जन्मों की काल्पनिक कथाएं हैं। ईसा पूर्व पहली शताब्दी में जातकों की रचना आरम्भ हो चुकी थी, जिसका स्पष्ट प्रमाण भरहुत और सांची के स्तूप की वेष्टनी पर उत्कीर्ण दृश्यों से स्पष्ट है। जातक गद्य एवं पद्य दोनों में लिखे गये हैं जिनमें पद्यांश अधिक  प्राचीन है। जातकों  की संख्या 550 है। निकायों में बौद्ध धर्म के सिद्धांत तथा कहानियों का संग्रह है।प्राचीनतम बौद्ध ग्रन्थ पालि भाषा में है। पालि भाषा में लिखे गये बौद्ध ग्रन्थों को द्वितीय या प्रथम सदी ई.पू. का माना जाता है।
  •  बुद्ध घोष कृत विशुद्ध मग्ग बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा का ग्रन्थ है । यह बौद्ध सिद्धातों पर प्रमाणिक दार्शनिक ग्रन्थ स्वीकार किया गया है । 
  • बौद्धों के धार्मिकेतर साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण और रोचक है गौतम बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाएं (जातक) ये जातक ईसा पूर्व पांचवी सदी से दूसरी सदी तक की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर प्रकाश डालते हैं।
  • बौद्ध ग्रन्थों को श्रीलंका में ई.पू. द्वितीय शताब्दी में संकलित किया गया।
  • दीपवंश एवं महावंश की रचना क्रमशः चौथी एवं पांचवी शताब्दी में हुई। इन पालि ग्रन्थों से मौर्य कालीन इतिहास के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।
  • पालि भाषा का एक अन्य महत्वपूर्ण ग्रन्थ नागसेन द्वारा रचित मिलिन्द पन्हो (मिलिन्द प्रश्न) है। इसमें यूनानी राजा मिनाण्डर और बौद्ध भिक्षु नागसेन का दार्शनिक वार्तालाप है।
  • दिव्यावदान में अनेक राजाओं की कथाएं हैं। आर्य-मंजू-श्री-मूल-कल्प में बौद्ध दृष्टिकोण से गुप्त सम्राटों का वर्णन मिलता है।
  • अंगुतर निकाय में सोलह महाजनपदों का वर्णन मिलता है।
  • संस्कृत में लिखे गये बौद्ध ग्रन्थों में ललित-विस्तार का विशेष स्थान है। इसमें महात्मा बुद्ध के जीवन वृत्त का चित्रण है
  • संस्कृत भाषा में लिखे गये बौद्ध  ग्रंथों  में अश्वघोषकी रचनाएं बुद्धचरित, सौन्दरानन्द, सारिपुत्र प्रकरण आदि महत्वपूर्ण है।

जैन साहित्य

  • जैन साहित्य को आगम सिद्धांत कहा जाता है। जैन आगमों में सबसे महत्वपूर्ण बारह अंग हैं।
  • आचारांग सूत्र में जैन भिक्षुओं के आचार नियमों का उल्लेख है।
  • भगवती सूत्र में महावीर के जीवन पर कुछ प्रकाश पड़ता है।
  • नायाधम्मकहा में महावीर की शिक्षाओं का संग्रह है।
  • बारह अंगों में प्रत्येक का उपांग भी है। इन पर अनेक भाष्य लिखे गये जो निर्युक्ति, चूर्णि, टीका कहलाते हैं।
  • जैन आगमों का वर्तमान रूप एक सभा में निश्चित किया गया था जो 513 या 526 ई0 (छठी सदी) में बलभी में हुई थी।
  • भगवती सूत्र में सोलह महाजनपदों का उल्लेख किया गया है।
  • जैन धर्म का प्रारम्भिक इतिहास कल्पसूत्र(लगभग चौथी शती ई.पू.) से ज्ञात होता है जिसकी रचना भद्रबाहु ने की थी।
  • जैन ग्रन्थ प्राकृत भाषा में रचे गए थे | इन ग्रन्थों में परिशिष्ट पर्व, भद्रबाहु चरित, कालिका पुराण ,आवश्यक सूत्र, आचारांग सूत्र, भगवती सूत्र, आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनमें अनेक ऐतिहासिक घटनाओं की सूचना मिलती है।
  • जैन ग्रन्थों में सबसे महत्वपूर्ण हेमचन्द्र कृत परिशिष्टपर्व है जिसकी रचना 12वीं शताब्दी में हुई। परिशिष्ट पर्व तथा भद्रबाहुचरित से चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन की प्रारम्भिक तथा उत्तरकालीन घटनाओं की सूचना मिलती है।
  • पूर्व मध्यकाल में अनेक जैन कथा कोशों और पुराणों की रचना हुई ।इनमें महत्वपूर्ण  हैं-हरिभद्र सूरि का समरादित्य कथा, मूर्खाख्यान और कथाकोशउद्योतन सूरि काकुवलयमाला’, जिनसेन का आदि पुराण तथा गुण भद्र का उत्तर पुराण आदि। इनसे तत्कालीन जैन समाज की सामाजिक, धार्मिक दशा पर प्रकाश पड़ता है।

लौकिक साहित्य

  • लौकिक साहित्य के अन्तर्गत ऐतिहासिक एवं अर्द्ध-ऐतिहासिक ग्रन्थों तथा जीवनियों का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है। इससे राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास की रूपरेखा स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण सहयोग मिलता है।
  • ऐतिहासिक रचनाओं में सर्वप्रथम उल्लेख अर्थशास्त्र का किया जा सकता है।
  • अर्थशास्त्र-इसे सम्भवतः भारत का पहला राजनीतिक ग्रन्थ माना जाता है। इसकी रचना चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्र सुप्रसिद्ध राजनीतिज्ञ कौटिल्य (चाणक्य, विष्णु गुप्त) ने की थी।
  • मौर्यकालीन इतिहास एवं राजनीति के ज्ञान के लिए अर्थशास्त्र ग्रन्थ एक प्रमुख स्रोत है। यह एक महत्वपूर्ण विधि ग्रन्थ है। पन्द्रह अधिकरणों या खण्डों में विभक्त अर्थशास्त्र का द्वितीय और तृतीय खण्ड सर्वाधिक प्राचीन है।
  • अर्थशास्त्र से प्राचीन राजतंत्र तथा अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए महद्यत्वपूर्ण सामग्री मिलती है।
  • विशाखदत्त के मुद्राराक्षस, सोमदेव के कथा सरित्सागर और क्षेमेन्द्र की वृहत्कथामंजरी से मौर्य काल की कुछ घटनाओं पर प्रकाश पड़ता है।
  • पंतजलि के महाभाष्य तथा कालिदास मालविकाग्निमित्र से शुंग काल के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। शूद्रक के मृच्छकटिकम् नाटक से तत्कालीन समाज का यथार्थ चित्र प्राप्त होता है।
  • कौटिल्यीय अर्थशास्त्र के अनेक सिद्धांतों को सातवीं-आठवीं शताब्दी ई0 में कामन्दक ने अपने नीतिसार में संकलित किया।
  • ऐतिहासिक रचनाओं में सर्वाधिक महत्व कश्मीरी कवि कल्हण द्वारा रचित ‘राजतरंगिणी’ का है। यह संस्कृत साहित्य में ऐतिहासिक घटनाओं के क्रमबद्ध इतिहास लिखने का प्रथम प्रयास है।
  • राजतरंगिणी की रचना (1149-50 ई0) 12वीं सदी में हुई। इससे कश्मीर के इतिहास के विषय में सम्पूर्ण जानकार प्राप्त होती है।
  • सोमेश्वरकृत ‘रसमालातथा कीर्तिकौमुदी, मेरूतुंग कृतप्रबन्धचिन्तामणि’, राजशेखर कतप्रबन्धकोशआदि ग्रन्थों से हमें गुजरात के चालुक्य वंश का इतिहास तथा उसके समय की संस्कृति का अच्छा ज्ञान प्राप्त होता है ।प्रबन्धचिन्तामणि अर्थशास्त्र की टीका है।
  • गार्गी संहिता एक ज्योतिष ग्रन्थ है। इसमें भारत पर होने वाले यवन आक्रमण, का उल्लेख मिलता है।
  • ऐतिहासिक जीवनियों में अश्वघोषकृत ‘बुद्धचरितबाणभट्ट का ‘हर्षचरित’, वाक्पति का गौडवहो, विल्हण का विक्रमांकदेव चरित, पद्यगुप्त का नव सहसांक चरित, संध्याकर नन्दी कृत ‘रामचरित’ हेमचन्द्र कृत ‘कुमारपाल चरित’ (द्वयाश्रय काव्य) जयानक कृत पृथ्वीराज विजय आदि महत्वपूर्ण हैं।
  • दक्षिण भारत का प्रारम्भिक इतिहास ‘संगम साहित्य’ से ज्ञात होता है। सुदूर दक्षिण के पल्लव और चोल शासकों का इतिहास नन्दिक्कलम्बकम, कलिगतुपरणि तथा चोल-चरित से प्राप्त होता है।
  • 13वीं शताब्दी के आरम्भ में अरब लोगों ने अरबी में सिन्ध का इतिहास लिखा जिसका फारसी अनुवाद ‘चचनामा’ नामक पुस्तक में उपलब्ध है।

 

विदेशियों का विवरण

  • विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरण से भी हमें भारतीय इतिहास की जानकारी मिलती है। जिसमें अनेक यूनानी, रोमन और चीनी यात्री सम्मिलित है। परन्तु भारतीय स्रोतों में सिकन्दर के आक्रमण की कोई जानकारी नहीं मिलती है।
  • यूनान के प्राचीन लेखकों में टेसियस तथा हेरोडोटस के नाम प्रसिद्ध  हैं। टेरियस ईरान का राजवैद्य था।
  • हेरोडोटस जिसे ‘इतिहास का पिता’ कहा जाता है, ने 5वीं सदी ई.पू. में ‘हिस्टोरिका’ नामक पुस्तक की रचना की जिसमें भारत और फारस के संबंधों का वर्णन किया गया है।
  • निर्याकस, आनेसिक्रिटस और अरिस्टोबुलस ये सभी लेखक सिकन्दर के समकालीन थे।
  • सिकन्दर के बाद के लेखकों में तीन राजदूतों-मेगस्थनीज, डायमेकस तथा डायोनोसियस के नाम उल्लेखनीय हैं। जो यूनानी शासकों द्वारा मौर्य दरबार में भेजे गये थे।
  • इनमें मेगस्थनीज सर्वाधिक प्रसिद्ध  था जो सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था उसने चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में 14 वर्ष व्यतीत किया। उसके द्वारा रचित इण्डिकामें मौर्य युगीन समाज एवं संस्कृति का विवरण मिलता है।
  • डायमेकस सीरियन नरेश अंत्तियोकस का राजदूत था जो बिन्दुसार के दरबार में काफी दिन तक रहा।
  • डायोनिसियस मिस्र नरेश टालमी फिलाडेल्फस के राजदूत के रूप में अशोक के दरबार में आया था।
  • यूनानी भाषा में लिखी गई टालमी की ज्योग्राफी और पेरिप्लस आफ द एरिथ्रियन सी नामक पुस्तक महत्वपूर्ण है। पेरिप्लस आफ एरिथ्रियन सी जिसकी रचना 80 से 115 ई0 के बीच हुई थी, में भारतीय बन्दरगाहों एवं व्यापारिक वस्तुओं का वर्णन मिलता है।
  • प्लिनी  की ‘नेचुरल हिस्टोरिका से भारतीय पशुओं, पौधों और खनिज पदार्थां की जानकारी मिलती है यह पहली सदी ई0 में लिखी गई
  • लैटिन भाषा में लिखी गई नेचुरल हिस्टोरिका में हमें भारत और इटली के बीच होने वाले व्यापार की जानकारी भी मिलती है।
  • चीनी यात्रियों के विवरण-चीनी लेखकों  के विवरण से भी भारतीय इतिहास पर प्रचुर प्रभाव पड़ता है। चीनी यात्री बौद्ध मतानुयायी थे। इन यात्रियों में सबसे महत्वपूर्ण फाह्यान, ह्वेनसांग (युवान च्वांग) और इत्सिंग के वर्णन हैं।
  • फाह्यान पांचवी सदी के प्रारम्भ  में चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के समय भारत आया था। उसने तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक स्थिति पर प्रकाश डाला है।
  • ह्वेनसांग सातवीं सदी में हर्ष के शासन काल में भारत आया था। वह भारत में 16 वर्षां तक रहा। 6 वर्ष तक उसने नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया।
  • ह्वेनसांग की भारत यात्रा का वृतान्त सी-यू-की नाम से जाना जाता है। जिसमें 138 देशों का विवरण मिलता है।
  • फाह्यान एवं ह्वेनसांग दोनों बौद्ध थे और बौद्ध तीर्थां का दर्शन करने तथा बौद्ध धर्म का अध्ययन करने भारत आये थे। फाह्यान 14 वर्ष ततक भारत में रहा।
  • इत्सिंग सातवीं सदी के अन्त में भारत आया था। वह बहुत समय तक विक्रमशिला एवं नालन्दा विश्वविद्यालयों में रहा। उसने बौद्ध शिक्षा संस्थाओं और भारतीयों की वेशभूषा, खानपान आदि के विषय में भी लिखा है।
  • मात्वान लिन ने हर्ष के पूर्वी अभियान एवं चाऊ-जू-कुआ ने चोल कालीन इतिहास पर प्रकाश डाला है।
  • चीनी यात्रियों में सर्वाधिक महत्व ह्वेनसांग अथवा युवान-च्वांग का ही है। उसे ‘प्रिंस ऑफ पिल्ग्रिम्स’ कहा जाता है।
  • अरबी यात्रियों के वृत्तान्त-अरब यात्रियों तथा लेखकों के विवरण से हमें पूर्व मध्यकालीन भारत के समाज एवं संस्कृति के विषय में जानकारी मिलती है। इन व्यापारियों एवं लेखकों में मुख्य है-अल्बरूनी, सुलेमान एवं अलमसूदी।
  • अरबी लेखकों में अल्बरूनी का नाम सर्वप्रसिद्ध  है। ग्यारहवीं शताब्दी में वह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था। उसने (अल्बरूनी) अपनी पुस्तकतहकीक--हिन्दअर्थात किताबुल हिन्द, में राजपूत कालीन समाज धर्म, रीति रिवाज आदि पर सुन्दर प्रकाश डाला है।
  • अल्बरूनी महमूद द्वारा बन्दी बनाया गया था। बाद में उसकी योग्यता से प्रभावित होकर उसे राजज्योतिषी के पद पर नियुक्त कर दिया।
  • अल्बरूनी ज्योतिष, गणित, विज्ञान, अरबी, फारसी तथा संस्कृत का अच्छा ज्ञाता था। वह गीता से विशेष रूप से प्रभावित था
  • 9वीं शताब्दी में भारत आनेवाला अरबी यात्री सुलेमान पाल एवं प्रतिहार शासकों के तत्कालीन आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक एवं दशा का वर्णन किया है।
  • बगदाद यात्री अलमसूदी राष्ट्रकूट एवं प्रतिहार शासकों के विषय में जानकारी देता है। यह दशवीं शताब्दी में भारत आया था।
  • उपर्युक्त विदेशी यात्रियों के विवरण के अतिरिक्त कुछ फारसी लेखकों के विवरण भी प्राप्त होते हैं इनमें महत्वपूर्ण-फिरदौसी कृतशाहनामामिनहाज-उस-सिराज कृत तबकात--नासिरी जियाउद्दीन बरनी कृत तारीख--फिरोजशाही आदि।

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